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वन पर्व
अध्याय १८०
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वैशम्पाय़न उवाच
यथाप्रतिज्ञं विहृतश्च कालः; सर्वाः समा द्वादश निर्जनेषु |  ३८   क
अज्ञातचर्यां विधिवत्समाप्य; भवद्गताः केशव पाण्डवेय़ाः ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति