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सौप्तिक पर्व
अध्याय ७
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द्रौणिरु उवाच
जनय़ेय़ुर्भय़ं ये स्म त्रैलोक्यस्यापि दर्शनात् |  ४९   क
तान्प्रेक्षमाणोऽपि व्यथां न चकार महावलः ||  ४९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति