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वन पर्व
अध्याय १३
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वैशम्पाय़न उवाच
वैनतेय़ो यथा पक्षी गरुडः पततां वरः |  ८२   क
तथैवाभिपतिष्यामि भय़ं वो नेह विद्यते ||  ८२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति