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कर्ण पर्व
अध्याय ४३
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सञ्जय़ उवाच
उपवासकृशो राजा भृशं भरतसत्तम |  १७   क
व्राह्मे वले स्थितो ह्येष न क्षत्रेऽतिवले विभो ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति