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द्रोण पर्व
अध्याय १३१
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सञ्जय़ उवाच
कार्ष्णाय़समय़ं घोरमृक्षचर्मावृतं महत् |  २६   क
युक्तं गजनिभैर्वाहैर्न हय़ैर्नापि वा गजैः ||  २६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति