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शान्ति पर्व
अध्याय ७
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वैशम्पाय़न उवाच
आत्मनो हि वय़ं दोषाद्विनष्टाः शाश्वतीः समाः |  ३०   क
प्रदहन्तो दिशः सर्वास्तेजसा भास्करा इव ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति