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भीष्म पर्व
अध्याय ४७
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सञ्जय़ उवाच
आचार्यमुपसङ्गम्य कृपं शल्यं च मारिष |  २   क
सौमदत्तिं विकर्णं च अश्वत्थामानमेव च ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति