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द्रोण पर्व
अध्याय १५२
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सञ्जय़ उवाच
स राक्षसेन्द्रं कौन्तेय़ः शरवर्षैरवाकिरत् |  २९   क
तानप्यस्याकरोन्मोघान्राक्षसो निशितैः शरैः ||  २९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति