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भीष्म पर्व
अध्याय ११२
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सञ्जय़ उवाच
चित्रसेनश्च तं राजंस्त्रिंशता नतपर्वणाम् |  २९   क
आजघान रणे क्रुद्धः स च तं प्रत्यविध्यत |  २९   ख
भीष्मस्य समरे राजन्यशो मानं च वर्धय़न् ||  २९   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति