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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७
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मरुत्त उवाच
सोऽहमिच्छामि भवता सर्वस्वेनापि याजितुम् |  १७   क
कामय़े समतिक्रान्तुं वासवं त्वत्कृतैर्गुणैः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति