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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ७
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वैशम्पाय़न उवाच
उपलभ्य ततः प्राणान्धृतराष्ट्रो महीपतिः |  ७   क
वाहुभ्यां सम्परिष्वज्य मूर्ध्न्याजिघ्रत पाण्डवम् ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति