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मौसल पर्व
अध्याय ७
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वसुदेव उवाच
आख्येय़ं तस्य यद्वृत्तं वृष्णीनां वैशसं महत् |  १४   क
स तु श्रुत्वा महातेजा यदूनामनय़ं प्रभो |  १४   ख
आगन्ता क्षिप्रमेवेह न मेऽत्रास्ति विचारणा ||  १४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति