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वन पर्व
अध्याय ८०
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पुलस्त्य उवाच
साय़ं प्रातः स्मरेद्यस्तु पुष्कराणि कृताञ्जलिः |  ५३   क
उपस्पृष्टं भवेत्तेन सर्वतीर्थेषु भारत |  ५३   ख
प्राप्नुय़ाच्च नरो लोकान्व्रह्मणः सदनेऽक्षय़ान् ||  ५३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति