सभा पर्व  अध्याय ७२

धृतराष्ट्र उवाच

अवृणोत्तत्र पाञ्चाली पाण्डवानमितौजसः |  २६   क
सरथान्सधनुष्कांश्चाप्यनुज्ञासिषमप्यहम् ||  २६   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति