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द्रोण पर्व
अध्याय २
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कर्ण उवाच
निवध्यतां मे कवचं विचित्रं; हैमं शुभ्रं मणिरत्नावभासि |  २३   क
शिरस्त्राणं चार्कसमानभासं; धनुः शरांश्चापि विषाहिकल्पान् ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति