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वन पर्व
अध्याय १९०
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वामदेव उवाच
जानामि पुत्रं दशवर्षं तवाहं; जातं महिष्यां श्येनजितं नरेन्द्र |  ७३   क
तं जहि त्वं मद्वचनात्प्रणुन्न; स्तूर्णं प्रिय़ं साय़कैर्घोररूपैः ||  ७३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति