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वन पर्व
अध्याय ८२
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पुलस्त्य उवाच
योनिद्वारं च तत्रैव विश्रुतं भरतर्षभ |  ८३   क
तत्राभिगम्य मुच्येत पुरुषो योनिसङ्करात् ||  ८३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति