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वन पर्व
अध्याय २५३
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वैशम्पाय़न उवाच
सरः सुपर्णेन हृतोरगं यथा; राष्ट्रं यथाराजकमात्तलक्ष्मि |  ५   क
एवंविधं मे प्रतिभाति काम्यकं; शौण्डैर्यथा पीतरसश्च कुम्भः ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति