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वन पर्व
अध्याय ७
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वैशम्पाय़न उवाच
भ्राता मम सुहृच्चैव साक्षाद्धर्म इवापरः |  ४   क
तस्य स्मृत्वाद्य सुभृशं हृदय़ं दीर्यतीव मे ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति