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विराट पर्व
अध्याय ७
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वैशम्पाय़न उवाच
अदृष्टपूर्वः पुरुषो रविर्यथा; वितर्कय़न्नास्य लभामि सम्पदम् |  ४   क
तथास्य चित्तं ह्यपि संवितर्कय़; न्नरर्षभस्याद्य न यामि तत्त्वतः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति