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सभा पर्व
अध्याय ५४
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युधिष्ठिर उवाच
एकैको यत्र लभते सहस्रपरमां भृतिम् |  २०   क
युध्यतोऽय़ुध्यतो वापि वेतनं मासकालिकम् |  २०   ख
एतद्राजन्धनं मह्यं तेन दीव्याम्यहं त्वय़ा ||  २०   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति