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वन पर्व
अध्याय २२७
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वैशम्पाय़न उवाच
परिदेवति तान्वीरान्धृतराष्ट्रो महीपतिः |  ३   क
मन्यतेऽभ्यधिकांश्चापि तपोय़ोगेन पाण्डवान् ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति