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द्रोण पर्व
अध्याय ८५
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सञ्जय़ उवाच
त्वं हि सत्यव्रतः शूरो मित्राणामभय़ङ्करः |  ४७   क
लोके विख्याय़से वीर कर्मभिः सत्यवागिति ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति