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शल्य पर्व
अध्याय २२
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सञ्जय़ उवाच
केचित्पदातय़ः पद्भिर्मुष्टिभिश्च परस्परम् |  ८५   क
निजघ्नुः समरे शूराः क्षीणशस्त्रास्ततोऽपतन् ||  ८५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति