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द्रोण पर्व
अध्याय ५
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सञ्जय़ उवाच
स एवमभ्यनुज्ञातश्चक्रे सेनापतिं ततः |  ३६   क
द्रोणं तव सुतो राजन्विधिदृष्टेन कर्मणा ||  ३६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति