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द्रोण पर्व
अध्याय ८५
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सञ्जय़ उवाच
रथैर्विपरिधावद्भिर्मनुष्यैश्च हय़ैश्च ह |  ७२   क
सैन्यं रजःसमुद्धूतमेतत्सम्परिवर्तते ||  ७२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति