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द्रोण पर्व
अध्याय ८५
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सञ्जय़ उवाच
केकय़ानां शतं हत्वा विद्राव्य च समन्ततः |  ३०   क
द्रोणस्तस्थौ महाराज व्यादितास्य इवान्तकः ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति