द्रोण पर्व  अध्याय ७

सञ्जय़ उवाच

स तीव्रं कोपमास्थाय़ रथे समरदुर्मदः |  ८   क
व्यधमत्पाण्डवानीकमभ्राणीव सदागतिः ||  ८   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति