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वन पर्व
अध्याय ८२
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पुलस्त्य उवाच
प्रदक्षिणमुपावृत्य गच्छेत भरतर्षभ |  २२   क
धारां नाम महाप्राज्ञ सर्वपापप्रणाशिनीम् |  २२   ख
तत्र स्नात्वा नरव्याघ्र न शोचति नराधिप ||  २२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति