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शल्य पर्व
अध्याय ७
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सञ्जय़ उवाच
अकल्प्यन्त च मातङ्गाः समनह्यन्त पत्तय़ः |  ३   क
हय़ानास्तरणोपेतांश्चक्रुरन्ये सहस्रशः ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति