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शल्य पर्व
अध्याय ७
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सञ्जय़ उवाच
हार्दिक्यं तु महेष्वासमर्जुनः शत्रुपूगहा |  ३०   क
संशप्तकगणांश्चैव वेगतोऽभिविदुद्रुवे ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति