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शान्ति पर्व
अध्याय १९२
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सावित्र्यु उवाच
किं प्रार्थय़सि विप्रर्षे किं चेष्टं करवाणि ते |  ११   क
प्रव्रूहि जपतां श्रेष्ठ सर्वं तत्ते भविष्यति ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति