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अनुशासन पर्व
अध्याय ९४
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वृषादर्भिरु उवाच
सा तथेति प्रतिश्रुत्य यातुधानी स्वरूपिणी |  ४४   क
जगाम तद्वनं यत्र विचेरुस्ते महर्षय़ः ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति