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आदि पर्व
अध्याय १
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सूत उवाच
यदाश्रौषं द्वारकाय़ां सुभद्रां; प्रसह्योढां माधवीमर्जुनेन |  १०३   क
इन्द्रप्रस्थं वृष्णिवीरौ च यातौ; तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||  १०३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति