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अनुशासन पर्व
अध्याय ७०
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भीष्म उवाच
गोषु क्षान्तं गोशरण्यं कृतज्ञं; वृत्तिग्लानं तादृशं पात्रमाहुः |  ३४   क
वृत्तिग्लाने सम्भ्रमे वा महार्थे; कृष्यर्थे वा होमहेतोः प्रसूत्याम् ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति