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अनुशासन पर्व
अध्याय ७०
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नाचिकेत उवाच
गावो लोकान्धारय़न्ति क्षरन्त्यो; गावश्चान्नं सञ्जनय़न्ति लोके |  ५१   क
यस्तज्जानन्न गवां हार्दमेति; स वै गन्ता निरय़ं पापचेताः ||  ५१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति