आश्वमेधिक पर्व  अध्याय ७०

वैशम्पाय़न उवाच

समनुज्ञाप्य तु स तं कृष्णद्वैपाय़नं नृपः |  १८   क
वासुदेवमथामन्त्र्य वाग्मी वचनमव्रवीत् ||  १८   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति