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सभा पर्व
अध्याय ७०
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वैशम्पाय़न उवाच
कथं वत्स्यथ दुर्गेषु वनेष्वृद्धिविनाकृताः |  १६   क
वीर्यसत्त्ववलोत्साहतेजोभिरकृशाः कृशाः ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति