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सभा पर्व
अध्याय ७०
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वैशम्पाय़न उवाच
यद्येतदहमज्ञास्यं वनवासो हि वो ध्रुवम् |  १७   क
शतशृङ्गान्मृते पाण्डौ नागमिष्यं गजाह्वय़म् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति