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शल्य पर्व
अध्याय ३७
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वैशम्पाय़न उवाच
पितामहस्य महतो वर्तमाने महीतले |  ५   क
वितते यज्ञवाटे वै समेतेषु द्विजातिषु ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति