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वन पर्व
अध्याय २१
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वासुदेव उवाच
ततोऽहं भरतश्रेष्ठ समाश्वास्य पुरे जनम् |  ७   क
राजानमाहुकं चैव तथैवानकदुन्दुभिम् |  ७   ख
सर्ववृष्णिप्रवीरांश्च हर्षय़न्नव्रुवं तदा ||  ७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति