वन पर्व  अध्याय ७०

वृहदश्व उवाच

वाहुकस्तमुवाचाथ देहि विद्यामिमां मम |  २४   क
मत्तोऽपि चाश्वहृदय़ं गृहाण पुरुषर्षभ ||  २४   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति