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वन पर्व
अध्याय ७०
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वृहदश्व उवाच
एवमुक्तो नलो राजा न्ययच्छत्कोपमात्मनः |  ३४   क
ततो भीतः कलिः क्षिप्रं प्रविवेश विभीतकम् |  ३४   ख
कलिस्त्वन्येन नादृश्यत्कथय़न्नैषधेन वै ||  ३४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति