वन पर्व  अध्याय ७०

वृहदश्व उवाच

हय़ोत्तमानुत्पततो द्विजानिव पुनः पुनः |  ३७   क
नलः सञ्चोदय़ामास प्रहृष्टेनान्तरात्मना ||  ३७   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति