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वन पर्व
अध्याय ७०
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वृहदश्व उवाच
नलस्तं प्रत्युवाचाथ दूरे भ्रष्टः पटस्तव |  ५   क
योजनं समतिक्रान्तो न स शक्यस्त्वय़ा पुनः ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति