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द्रोण पर्व
अध्याय १६१
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सञ्जय़ उवाच
व्याक्षिपन्नाय़ुधानन्ये ममृदुश्चापरे भुजान् |  २७   क
अन्ये चान्वपतन्द्रोणं त्यक्तात्मानो महौजसः ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति