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वन पर्व
अध्याय ४०
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वैशम्पाय़न उवाच
किं नु मोक्ष्यामि धनुषा यन्मे वाणाः क्षय़ं गताः |  ३७   क
अय़ं च पुरुषः कोऽपि वाणान्ग्रसति सर्वशः ||  ३७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति