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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४७
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नारद उवाच
स राजा जाह्नवीकच्छे यथा ते कथितं मय़ा |  ५   क
तेनाग्निना समाय़ुक्तः स्वेनैव भरतर्षभ ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति