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उद्योग पर्व
अध्याय ७०
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युधिष्ठिर उवाच
सर्वथा वृजिनं युद्धं को घ्नन्न प्रतिहन्यते |  ५३   क
हतस्य च हृषीकेश समौ जय़पराजय़ौ ||  ५३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति