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वन पर्व
अध्याय ३८
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वैशम्पाय़न उवाच
इत्युक्त्वा फल्गुनं शक्रो जगामादर्शनं ततः |  ४५   क
अर्जुनोऽप्यथ तत्रैव तस्थौ योगसमन्वितः ||  ४५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति