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द्रोण पर्व
अध्याय ७०
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सञ्जय़ उवाच
अथापरेऽपि राजानः परावृत्य समन्ततः |  १४   क
महावला रणे शूराः पाञ्चालानन्ववारय़न् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति